top 10 moral stories in hindi for kids

Top 10 moral stories in Hindi for kids

1. घमंडी घोड़ा और बकरा

एक राजा को जानवर बहुत प्रिय थे राजा ने अपने राज्य में हर प्रकार के जानवरों को इकट्ठा कर रखा था| उन जानवरों में एक बहुत ही खूबसूरत घोड़ा भी था| वह घोड़ा राजा का सबसे प्रिय जानवर था राजा जहां भी जाते थे उस  घोड़े की ही सवारी करते थे दिनभर राजा को अपनी पीठ पर लादे लादे उस बेचारे घोड़े की कमर टूट जाती थी|  top 10 short moral stories in Hindi

हालांकि घोड़े की खातिरदारी भी जमकर होती थी

अलग-अलग तरह के बढ़िया और जायकेदार पकवान उस घोड़े के लिए बनवाए जाते थे

सभी जानवरों में उस घोड़े को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था

बड़े-बड़े हाथी भी घोड़े को झुक कर सलाम करते थे|

अब घोड़े को धीरे-धीरे घमंड होने लगा कि सब उसकी तारीफ करते हैं,

क्योंकि वह सभी जानवरों में सबसे सुंदर है और मेरी सुंदरता के कारण राजा को सम्मान मिलता है|

जिस दिन मैं नहीं रहूंगा तो राजा का सारा मान-सम्मान खत्म हो जाएगा|

लिहाजा घोड़े ने तय किया कि अब वह सिर्फ अपनी मनमर्जी चलाएगा|

अगले दिन घोड़ा बीमार होकर बैठ गया सभी जानवरों ने उसे समझाया कि राजा के जाने का समय हो रहा है, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ|

Moral Top 10 stories in Hindi

राजा ने शाही वैद्य को बुलवाया वैद्य ने घोड़े को देखा और बोला, यह घोड़ा अब दौड़ने लायक नहीं रहा महाराज|

अगर यह अगले 3 दिनों में उठकर खड़ा नहीं हुआ तो इसे मार देना ही अच्छा होगा|

लेकिन घोड़ा अच्छी तरह समझता था कि राजा की जान उसी में बसी है इसलिए राजा उसे नहीं मारेंगे इस तरह 2 दिन बीत गए|

तीसरे दिन घोड़े के पास वाले तबेले में एक नया बकरा आया घोड़े को लगा कि यह बकरा तो मुझसे भी सुंदर है|

कहीं यह बकरा मेरी जगह ना ले ले|

घोड़े ने अपनी कहानी उस बकरे को बताई घोड़े ने बकरे को बताया कि किस तरह उसने राजा की नजरों में अपनी इज्जत एकदम गिरा दी है|

बकरे ने घोड़े को सांत्वना दी और कहा मैं तुम्हारे लिए राजा से बात करूंगा|

तभी राजा ने बकरे को बुलावा भेजा

जब बकरा राजा के पास पहुंचा तो उसने राजा से घोड़े की खूब तारीफ की और बताया कि घोड़ा राजा को बेहद चाहता है|

राजा यह सुनकर खुश हो गया और उन्होंने राज्य में शाही भोज का ऐलान कर दिया|

अगले दिन घोड़ा तो खुशी-खुशी वापस राजा की सवारी बन गया लेकिन बेचारा बकरा शाही भोज में पक गया|

सीख :- 

अपने काम से काम न रखने पर कभी-कभी नुकसान भी उठाना पड़ जाता है

 

2. सही समझ

( Very short moral stories )

एक समय की बात है एक गुरु जी के ३ शिस्य थे |

गुरु जी ने अपने ३ शिष्यों को एक पोटली में कुछ दाल के दाने बांधकर दिए और कहा इन तीनो दानो को अपने अनुसार उपयोग करे |

और मुझसे १ साल बाद आकर मिले |

तीनो शिष्यों ने अपनी अपनी पोटली ली और चल दिए |

पहले शिष्य ने पोटली खोली उसने देखा इसमें तो मात्र चने के दाने है

उसने वो दाने लिए और पूजा में रख लिया की ये गुरु जी हमें प्रसाद दिया है और रोज़ उसकी पूजा करता |

दूसरे शिष्य ने देखा इसमें चने के दाने हैं तो उसने उसकी दाल बनायीं और उसने दाल खुद खायी और उसने अपने परिवार को खिला ली |

उधर तीसरे शिष्य ने देखा और सोचा की गुरु जी ने ये दाल के दाने दिए है

तो इसमें कुछ रहस्य होगा उसने वो दाने जमीन में गाड़ दिए

जिससे १ साल में बहुत खेत हो गया की और उसमे खूब दाल लगी

जिससे जो भी आता तो उसे खूब दाल रोटी खिलाते

१ साल बाद तीनो शिष्य गुरु जी के पास आये

और तीनो ने एक एक कर गुरु जी को बताया कि उन्होंने उस पोटली के साथ क्या किया .

गुरु जी ने बताया की की मैंने एक जैसा ज्ञान दिया है

सब को दिया पर सब ने अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्ञान को उठाया |

Top 10 Moral Hindi stories:-

यही सब हमारे साथ भी होता है एक क्लास में टीचर सब बच्चो को एक साथ पढ़ते हैं एक जैसा पढ़ते हैं पर कोई बच्चा टॉप करता है कोई फ़ैल हो जाता है हम अपनी बुद्धि को कितना स्थिर करते हैं , कैसे अपने दिमाग को use करते हैं यही हमरे जीवन की दिशा को निश्चित करता है . इसलिए हमेशा लर्निंग ऐटिटूड रखे , सीखते चले और जीवन को अच्छा बनाये .

 

3. दो हंस और एक कछुआ

किसी तालाब में कम्बुग्रीव नामक एक कछुआ रहता था।

तालाब के किनारे रहने वाले संकट और विकट नामक हंस से उसकी गहरी दोस्ती थी।

तालाब के किनारे तीनों हर रोज खूब बातें करते और शाम होने पर अपने-अपने घरों को चल देते।

एक वर्ष उस प्रदेश में जरा भी बारिश नहीं हुई।

धीरे-धीरे वह तालाब भी सूखने लगा।

अब हंसों को कछुए की चिंता होने लगी।

जब उन्होंने अपनी चिंता कछुए से कही तो कछुए ने उन्हें चिंता न करने को कहा।

उसने हंसों को एक युक्ति बताई।

उसने उनसे कहा कि सबसे पहले पानी से लबालब किसी तालाब की खोज करें फिर एक लकड़ी के टुकड़े से लटकाकर उसे उस तालाब में ले चलें।

उसकी बात सुनकर हंसों ने कहा कि वह तो ठीक है पर उड़ान के दौरान उसे अपना मुंह बंद रखना होगा।

कछुए ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह किसी भी हालत में अपना मुंह नहीं खोलेगा।

कछुए ने लकड़ी के टुकड़े को अपने दांत से पकड़ा फिर दोनो हंस उसे लेकर उड़ चले।

रास्ते में नगर के लोगों ने जब देखा कि एक कछुआ आकाश में उड़ा जा रहा है तो वे आश्चर्य से चिल्लाने लगे।

लोगों को अपनी तरफ चिल्लाते हुए देखकर कछुए से रहा नहीं गया।

वह अपना वादा भूल गया।

उसने जैसे ही कुछ कहने के लिए अपना मुंह खोला कि आकाश से गिर पड़ा।

ऊंचाई बहुत ज्यादा होने के कारण वह चोट झेल नहीं पाया और अपना दम तोड़ दिया।

तो दोस्तों इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि

बुद्धिमान भी अगर अपनी चंचलता पर काबू नहीं रख पाता है तो परिणाम काफी बुरा होता है।

 

4. भेड़िया आया, भेड़िया आया

किसी गांव में एक चरवाहा बालक रहता था।

पुरे गाँव भर की भेड़ों को वह प्रतिदिन पहाड़ी पर स्थित चारागाह में ले जाता और उन्हें घास चरने के लिए छोड़ देता।

चरवाहा बालक अपने काम को हर रोज अच्छे से कर रहा था।

मगर एक ही जगह उन सभी भेड़ों को प्रतिदिन ले जाकर चराते-चराते बेचारा ऊब सा गया था।

उसने सोचा कि क्यों न दिल बहलाने के लिए कुछ हंसी मजाक किया जाए।

बस इस खयाल के आने की देर थी, चरवाहा जोर-जोर से डरी हुई आवाज में चिल्लाने लगा – “भेड़िया आया! भेड़िया आया।

बचाओ….बचाओ। भेड़िया भेड़ों को खा रहा है।”

आस-पास के खेतों में काम कर रहे लोगों ने जब चरवाहे की आवाज सुनी तो उनके हाथों में जो कुछ भी था, उन्हें लिए दौड़े चले आए।

परंतु वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि भेड़ें तो आराम से चर रही थी और चरवाहा बालक हंस रहा था।

”कहां है भेड़िया?“ गांव वाले क्रोध में बोले।

मगर चरवाहा हंसता ही रहा, उसे गाँव वालों को बेवकूफ बनाने में बहुत मजा आया।

हर रोज की तरह दूसरे दिन भी चरवाहा भेड़ों को चराने पहाड़ी वाले मैदान में ले गया।

मगर जब वह एक पेड़ के नीचे बैठा अपनी बांसुरी बजा रहा था, तभी उसे गुर्राने की आवाज सुनाई दीं।

उसने सिर उठाकर देखा तो कुछ दूर पर सचमुच एक बड़ा सा भयानक भेड़िया गुर्राता हुआ भेड़ों की ओर बढ़ रहा था।

भेड़ों ने एक खूंखार भेड़ियों को अपनी ओर बढ़ते देखा तो मिमियाकर इधर-उधर भागने लगीं।

चरवाहा बालक भयभीत हो गया। लगा जोर जोर से चिल्लाने- ”भेड़िया आया! भेड़िया आया। बचाओ….बचाओ।“

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इस बार वह बहुत डरा हुआ था। चिल्ला-चिल्ला कर सहायता की गुहार लगा रहा था। वह कांप रहा था और गांव की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा था। मगर गांव वालों ने सोचा कि चरवाहा बालक मजाक कर रहा होगा। वे नहीं आए।

भेड़िये ने भी चरवाहे बालक को भय से कांपते देख तो समझ गया कि अब कोई नहीं है, जो उसका मुकाबला कर सके। बस फिर क्या था, भेडि़ए ने एक भेड़ की गरदन पकड़ी और देखते ही देखते उसे लेकर भाग गया। भेड़ें बुरी तरह मिमियाती और छटपटाती रहीं।

चरवाहा बालक रोता हुआ गांव वालों के पास आया और दर्दभरी कहानी सुनाई। वह अपने किए पर बुरी तरह पछता रहा था। चरवाहे बालक के माता-पिता तथा गांव वालों ने उसे खूब डांटा। बालक ने भी अपने मूर्खतापूर्ण कार्य के लिए क्षमा मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा मजाक नहीं करेगा।

दोस्तों हमें इस कहानी से यही सीख मिलती है कि –

जिस इंसान की झूठ बोलने की प्रवृति बन जाती है, उसकी कही गई सच्ची बात पर भी किसी को भरोषा नहीं होता। अतः झूठ बोलने से बचे। झूठ बोलने से किसी का लाभ नहीं होता, इसके विपरीत नुकसान होना संभव है।

 

5. ऊंट और सियार

एक बड़े से जंगल में काफी सारे जानवर रहते थे।

उसी जंगल में एक ऊंट और एक सियार भी रहते थे।

उन दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी।

कोई भी काम हो, दोनों हमेशा साथ में मिलकर करते थे।

भोजन की तलाश में भी दोनों साथ ही निकलते थे।

एक दिन दोनों को बहुत जोरों की भूख लगी पर उनके लिए कोई भोजन का बंदोबस्त नहीं हो पा रहा था।

दोनों भोजन की तलाश में इधर उधर भटक रहे थे।

अचानक ऊंट को तरबूज का बड़ा सा खेत दिखाई दिया और उसने सियार को खेत के बारे में बताया।

फिर दोनों ने मिलकर यह निर्णय कर लिया की आज का भोजन वे यहीं पर कर के जाएंगे।

पर समस्या यह थी की खेत और उन दोनों के बीच एक बड़ी सी नदी बह रही थी।

दोनों ने मिलकर इस समस्या का समाधान निकाल लिया।

तय ये हुआ कि सियार ऊंट के पीठ पर चढ़ जाएगा और ऊंट अपने लम्बे पैरों की बदौलत नदी को पार कर जाएगा।

इस तरह ऊंट और सियार दोनों ने नदी को पार कर तरबूज के खेत में चले गए और दोनों ने जम के तरबूज खाए।

सियार का पेट छोटा था सो जल्दी भर गया पर ऊंट का पेट तो बहुत बड़ा था, जो अभी तक नहीं भरा था।

सियार की एक बड़ी गन्दी आदत थी, खाना खाने के बाद वो जोर जोर से आवाजें निकालता था।

उसका कहना था कि खाने के बाद आवाजें निकालने से उसको भोजन पचाने में मदद होती है।

सियार ने जब आवाज निकालना शुरू किया तो ऊंट ने उससे बहुत मिन्नतें की, कि वो अभी आवाज ना निकालें।

उसे अभी और खाना है और अगर वो लगातार आवाजें निकालता रहा तो खेत का मालिक आ जाएगा।

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मालिक के आने पर सियार तो कहीं छुप-छुपाकर भाग जाएगा पर ऊंट तो कहीं छिप भी नहीं सकता और तेज उससे भागा नहीं जाता।

ऊंट की इतनी मिन्नतों के बाद भी सियार ने आवाजें निकालना बंद नहीं किया और उसके परिणाम स्वरुप मालिक डंडा लेकर भागा-भागा आया।

मालिक को देखते ही सियार तो भाग खड़ा हुआ पर ऊंट भाग नहीं पाया और उसकी जमकर पिटाई हो गई।

किसी तरह अपनी जान बचाकर जब ऊंट नदी किनारे पहुँचा तो सियार वहाँ उसका इंतजार कर रहा था।

ऊंट काफी गुस्से में था। ऊंट को देखते ही सियार ने अपनी सफाई देनी शुरू कर दी। उसका कहना था कि खाने के बाद आवाजें निकालने से वो खुद को रोक नहीं पाता है। इसीलिए ऐसा हो गया। अब बारी थी नदी को पार करने की, सो सियार पहले की तरह ऊंट के पीठ पर सवार हो गया। ऊंट जब नदी के ठीक बीचो-बीच पहुँच गया तब उसने सियार से कहा कि उसे नदी में बैठने का मन कर रहा है। 3सियार ने ऊंट को अपनी जान की दुहाई देते हुए कहा कि अगर तुम नदी में बैठोगे तो मैं तो डूब जाऊँगा। कृपया ऐसा काम मत करो। पर जैसा की खेत में सियार ने किया था, ऊंट ने भी अपने मन की इच्छा पूरी की और पानी में बैठ गया। ऊंट के बैठते ही पानी के तेज बहाव में सियार बह गया और डूब गया।

तो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि :

दोस्तों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि आप जैसा करोगे, वैसा ही पाओगे। आप किसी के भी साथ ऐसा व्यवहार मत कीजिये जैसा व्यवहार आप खुद के साथ होते हुए नहीं देख सकते।

 

6. राजा और मुर्ख बन्दर 

बहुत पुरानी बात है।

एक राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था।

वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र था।

वह बन्दर हमेशा राजा की सेवा में लगा रहता था।

अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक आ-जा सकता था।

एक दिन जब राजा सो रहा था और बन्दर पंखा झल रहा था तो बन्दर ने देखा, एक मक्खी बार-बार राजा के नाक पर बैठ जाती थी। पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी, उड़कर फिर वहीं बैठी जाती थी। इस मक्खी की वजह से राजा की नींद में खलल पड़ रही थी। बीच-बीच में राजा स्वयं आधे नींद में उस मक्खी को भगाने की कोशिश कर रहे थे। बन्दर यह सब देख रहा था और मक्खी को भगाने की कोशिश में लगा हुआ था।

बार-बार भगाने के बाद भी जब मक्खी नहीं भागी तो बन्दर को क्रोध आ गया। उसने पंखा छोड़ कर वहीं बगल में रखी राजा की तलवार हाथ में ले ली; और इस बार जब मक्खी राजा के नाक पर बैठी तो उसने पूरे बल से मक्खी पर तलवार से वार कर दिया। मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की नाक तलवार की प्रहार से कट गई।

सीख :

मुर्ख दोस्त से कहीं अच्छा विद्वान् दुश्मन होता है।

 

7. गौरैया और बन्दर

एक राज्य के बगल में एक घना जंगल था।

उस जंगल के एक बड़े वृक्ष की शाखा पर चिड़ा-चिड़ी का एक जोड़ा रहता था। उन दोनों ने बड़े जतन और लगन से उस पेड़ की शाखा पर अपना घोसला बनाया हुआ था और दोनों अपने घोंसले में बड़े सुख से रहते थे।

 

देखते ही देखते सर्दी का मौसम आ गया। एक दिन उस जंगल में बड़ी ठंडी हवा चलने लगी और साथ में हलकी बूंदा-बांदी भी शुरु हो गई। उस समय एक बन्दर ठंडी हवा और बरसात से ठिठुरता हुआ उस वृक्ष की शाखा पर आ बैठा।

जाड़े के कारण उसके दांत कटकटा रहे थे। उसे देखकर चिड़िया ने कहा – “अरे ! तुम कौन हो ? देखने में तो तुम्हारा चेहरा आदमियों का सा है; हाथ-पैर भी हैं तुम्हारे । फिर भी तुम यहाँ बैठे हो, घर बनाकर क्यों नहीं रहते? घर बनाकर रहोगे तो ठण्ड और बारिश से कभी परेशानी नहीं होगी।”

बन्दर बोला – “अरी ! तुम से चुप नहीं रहा जाता? तू अपना काम कर । मेरा मजाक क्यों उड़ा रही है?”

चिड़िया ने बन्दर की बातों पर ध्यान ना देते हुए अपने ही धुन में कुछ-कुछ कहती चली गई। चिड़िया के इस व्यवहार से बन्दर चिढ़ गया और गुस्से में आकर उसने चिड़िया के घोंसले को तोड़-फोड़ डाला, जिसमें चिड़ा-चिड़ी सुख से रहते थे।

 सीख :

हर किसी को उपदेश नहीं देना चाहिये। बुद्धिमान्‌ को दी हुई शिक्षा का ही फल होता है, मूर्ख को दी हुई शिक्षा का फल कई बार उल्टा निकल आता है।

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Source :- Hindikahani